स्वामी दयानंद सरस्वती जी
उपलब्धियाँ: आर्य समाज की स्थापना की और वैदिक शिक्षा प्रदान करने के लिए गुरुकुल स्थापित किए। दयानंद सरस्वती भारत के इतिहास के सबसे क्रांतिकारी सामाजिक-धार्मिक सुधारकों में से एक थे। स्वामी दयानंद सरस्वती आर्य समाज के संस्थापक थे और उन्होंने उस समय वेदों के समतावादी दृष्टिकोण का प्रचार किया जब समाज में व्यापक जातिवाद व्याप्त था।
महात्मा आर्य भिक्षु एवंम माता लीलावती आर्य
(संस्थापक)
नाम रामजी प्रसाद गुप्त (बचपन का महात्मा आर्यभिक्षु (वानप्रस्थ का), स्वामी आत्मबोध सरस्वती (संन्यास का) । पिता-माता श्री पूर्णमासी प्रसाद गुप्त व श्रीमती राजकुमारी पिता व्यवसायी व बैंकर। पौराणिक विचारधारा के। राजनीति से सम्बन्ध : 1942 में पढ़ाई छोड़कर भारत छोड़ो आन्दोलन में भागीदारी। समाज सेवा : मुगलसराय नगर पालिका के लम्बे समय तक अध्यक्ष रहे।
आर्य समाज हरिद्वार
माता लीलावती आर्य भिक्षु परोपकारिणी
न्यास (रजि०)
माता लीलावती आर्य भिक्षु परोपकारिणी न्यास (रजि०)
ट्रस्ट के बारे में
माता लीलावती आर्य भिक्षु परोपकारिणी न्यास (रजि०) की स्थापना वर्ष 2000 में महात्मा आर्य भिक्षु के द्वारा की गयी।
न्यास का कार्य क्षेत्र सम्पूर्ण भारत वर्ष है। न्यास का कार्यालय: कुटी नंबर 53, आर्य वानप्रस्थ आश्रम ज्वालापुर, हरिद्वार है। ट्रस्ट के निम्नलिखित उद्देश्य है:
- महर्षि दयानन्द सरस्वती कृत सत्यार्थ प्रकाश आदि अन्यो का प्रचार एवं प्रसार ।
अनाथ व अबलाओ की सहायता । - असहाय वैदिक विद्वानो उपदेशको एवं भजनी की सहायता करना ।
- वेद पढ़ने वाले निर्धन विद्यार्थियों को मासिक वृति देना ।
- आर्यवानप्रस्थ, ज्वालापुर में असहाय साधना कर रहे भाई बहनो का आर्थिक सहायता प्रदान करना ।
- स्वामी आत्मबोध इस ट्रस्ट के अपने जीवन काल तक प्रधान मैनेजिंग ट्रस्टी रहेंगे।
स्वामी आत्मबोध की मृत्यु के बाद अन्य ट्रस्टीगण बहुमत से किसी भी अन्य ट्रस्टी को प्रधान चुन सकेंगे । और ऐसा चुना गया प्रधान 3 वर्ष तक प्रधान पद पर आसीन रहेगा। और तत्पश्चात हर तीन वर्ष के बाद नया चुनाव हुआ करेगा। - ट्रस्ट के श्री देवराज मंत्री नियुक्त किये उक्त पद पर आसीन रहेंगे। जब तक ट्रस्ट को विधिवत हुआ करेगा।
- स्वामी आत्मबोध की मृत्यु के पश्चात प्रधान का चुनाव 3 वर्ष की अवधि के लिये होगा।
दान की प्रकिया
माता लीलावती आर्य भिक्षु परोपकारिणी न्यास (रजि०) विभिन्न प्रकार के कार्यों व संस्था के उद्देश्य को संचालित करने के लिए दान लेता है जैसे :
- महर्षि दयानन्द सरस्वती कृत सत्यार्थ प्रकाश आदि अन्यो का प्रचार एवं प्रसार ।
अनाथ व अबलाओ की सहायता । - असहाय वैदिक विद्वानो उपदेशको एवं भजनी की सहायता करना ।
- वेद पढ़ने वाले निर्धन विद्यार्थियों को मासिक वृति देना ।
- आर्यवानप्रस्थ, ज्वालापुर में असहाय साधना कर रहे भाई बहनो का आर्थिक सहायता प्रदान करना ।
आर्य समाज के नियम तथा उद्देश्य
(विश्व शान्ति के आधार)
- सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उन सब का आदि मूल परमेश्वर है।
- ईश्वर सच्चिदानन्द स्वरुप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य पवित्र और सृष्टिकर्ता है। उसी की उपासना करने योग्य है। 3. वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है वेद का पढ़ना पढ़ाना और सुनना सुनाना सब आर्यो का परम धर्म है।
- सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए।
- सब काम धर्मानुसार अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिए।
- संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना।
- सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार यथा योग्य वर्तना चाहिए।
सत्योपदेश
- शरीर में ही सुख-दुख होते हैं। इस द्वंद से ऊपर उठाना ही मोक्ष है।
- इच्छा का नाम ही वासना है। यही जन्म मरण के चक्कर का मूल है, इससे छूटना ही अपना लक्ष्य है।
- विधि निषेध का ज्ञान है, मानव जीवन का स्वाध्याय है।
- भगवान की विभूति का नाम सत्य है और उसके विधान का ऋत है।
- इंद्रियों का संयम विजय तथा संपत्ति का मार्ग है और इनका असंयम ही पराजय तथा विपत्ति का मार्ग है।
- जीवन के वाम और दक्ष दो मार्ग हैं। जिसकी इच्छा चाहे जहां जाए, योग की या अथवा भोर की ओर।
ओ३म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव।
यद् भद्रं तन्न आ सुव॥
मंत्रार्थ – हे सब सुखों के दाता ज्ञान के प्रकाशक सकल जगत के उत्पत्तिकर्ता एवं समग्र ऐश्वर्ययुक्त परमेश्वर! आप हमारे सम्पूर्ण दुर्गुणों, दुर्व्यसनों और दुखों को दूर कर दीजिए, और जो कल्याणकारक गुण, कर्म, स्वभाव, सुख और पदार्थ हैं, उसको हमें भलीभांति प्राप्त कराइये।