हमारे परम पूज्य पिताजी श्री डेवनदास जी आर्य समाज सक्खर सिन्ध के सदस्य रहे। जब 1947 में देश का विभाजन हुआ तो सब कुछ छोड़कर परिवार के साथ हरिद्वार आ गये। हरिद्वार में आकर पुनः लकड़ी का व्यापार प्रारम्भ किया। उस समय पिताजी की आयु 44 वर्ष की थी। उनका जन्म 1903 में हुआ। मेरा जन्म 1936 में सक्खर सिन्ध में हुआ। मेरे पिता जी सक्खर में भी आर्य समाज के कार्यों में विशेष श्रद्धा के साथ भाग लेते रहे। मेरी शिक्षा आर्य इंटर कॉलेज में पूर्ण हुई ।
यहाँ आकर भी वे आर्य समाजों के कार्यक्रमों में भाग लेने लगे। पूज्य महात्मा आनन्द स्वामी जी, डॉ. धर्मपाल जी, श्री सत्यपाल जी, श्री प्रकाशवीर शास्त्री जी तथा कई विद्वानों के साथ उनका आत्मीय सम्पर्क था। हरिद्वार में गंगा के किनारे बिरला घाट के समीप आर्य समाज निर्माण करने का विचार किया गया। विचार-विमर्श के पश्चात् पिता जी ने अपने नाम का बड़ा हाल बनवाया, उसके पश्चात् वहाँ यज्ञशाला तथा कमरे बने।
पिता जी के संस्कार बच्चों को मिले और वे आर्यसमाज से जुड़े। मेरे बड़े भाई श्री ढोलन दास जी आर्य समाज के प्रधान बने। 1952 में पूज्य माता भाग्यवन्ती जी द्वारा व्यास आश्रम का निर्माण हुआ। उसमें भी पिता जी व्यास आश्रम की गतिविधियों में भाग लेने लगे। हमारा भी वहाँ आना-जाना होने लगा। अप्रैल माह में होने वाले वार्षिक उत्सवों तथा अन्य कार्यक्रमों में सम्मलित होना प्रारम्भ हो गया। मुझे व्यास आश्रम का ट्रस्टी बना दिया गया।
सन् 1975 में आश्रम का प्रधान पद दिया गया। तब से अब तक प्रधान पद पर रहकर कुछ सेवा कर रहा हूँ तथा सावित्री देवी मेरी धर्मपत्नी भी पूरा साथ एवं सहयोग करती रही। माता भाग्यवन्ती देवी, बहन विमला गुप्ता, बहन शांति गुप्ता, महात्मा आनन्द स्वामी, पं० रामप्रसाद तथा, डॉ० महावीर से अच्छे संस्कार मिले, अब डॉ0 योगेश शास्त्री जी भी आर्य समाज एवं वेद प्रचार-प्रसार की सेवा में जुटें हुए है और आर्य समाज की गतिविधियों को हरिद्वार एवं सम्पूर्ण उत्तराखण्ड के साथ-साथ सम्पूर्ण देश में विस्तारित कर रहे हैं। उनका भी बहुत बहुत धन्यवाद।
व्यास आश्रम को बहन विमला गुप्ता के पुत्र श्री रमेश जी बहुत अच्छे ढंग से चला रहे हैं भगवान उनको शक्ति दें। अब मैं 88 वर्ष का हो गया हूँ, प्रभु मुझे सामर्थ्य दे मैं लग्न से कार्य करता रहूँ। हरिद्वार की जितनी भी आर्य संस्थाएँ हैं आर्य वानप्रस्थ आश्रम, आर्य समाज बी.एच.ई.एल. आर्य समाज, ज्वालापुर, आर्य समाज आर्यनगर, वैदिक मोहन आश्रम इत्यादि सभी संस्थाओं से जुड़ा हुआ हूँ। मेरे सुपुत्र श्री किशन कुमार, अशोक कुमार, राजेन्द्र कुमार भी मेरे कार्यों में सहयोग देते रहते हैं तथा कार्यक्रमों में भाग लेते है। मेरी पुत्री सीमा, दामाद श्री रामप्रकाश जी भी सुदर्शन पार्क, नई दिल्ली की आर्य समाज के प्रधान पद पर रह कर आर्य समाज का कार्य बड़ी लग्न से कार्य कर रहे हैं। मेरी प्रभु से प्रार्थना है कि मेरी तथा बच्चों की आर्य समाज तथा वेद प्रचार के कार्यों में लग्न लगी रहे। मेरा पूरा परिवार, तन, मन, धन से राष्ट्र सेवा से कार्यों में भाग लेकर अपने जीवन को आदर्श बनाये।