Mata Leelawati Arya Bhikshu Propkarini Nyas

महाभारत के बाद महर्षि दयानन्द पहला महामानव था जिसने सोचा कि बुराईयां, (दूरित) संगठित रहती हैं, उनमें संगठन की स्वत: क्षमता होती है। परन्तु सज्जन न संगठित हैं और न उनमें स्वतः संगठन की क्षमता है। अतः सज्जन सुखी हों, यह सोच महा दयानन्द ने आर्य समाज की स्थापना की।

धर्मात्मा ही सज्जन होते हैं, यह सोच महर्षि ने धर्म की • ओर देखा तो पाया कि धर्म के प्रांगण में विभाजन है। अत: उन्हें एक करने के लिए सनातन धर्म प्रतिनिधि, ईसाई प्रतिनिधि, मुसलमान प्रतिनिधि और केशव चन्द्र सेन को पत्र लिखा

“यद्यपि प्रत्येक मत पन्थ और सम्प्रदाय में अच्छी-अच्छी बातें है। किन्तु आचार्यों में परस्पर मतभेद होने के कारण (मुल्ला, पण्डित आदि) अनुयायियों में, मनुष्य समाज में घृणा द्वेष बना रहता है। क्या ही अच्छा होता सभी ‘आचार्य प्रवर एक स्थान पर सर्वतन्त्र सनातन सावभौम नियम बनाकर दुनिया का मार्गदर्शन करते ।”

महर्षि के कथानुसार सभी प्रतिनिधि एकत्र हुए, तब महाराज ने दो तरीके सभी आचार्य प्रवरों को एक होने के बताए।

1 – तर्क, युक्ति, प्रमाण, प्रयोग जहाँ है वही सर्वतन्त्र, सनातन, सार्वभौम विचार होगा। इस प्रतिज्ञा पर हस्ताक्षर कर आपस में धर्म का सही निर्णय कर लिया जाए।

परन्तु उस समय के सबसे बड़े बुद्धिमान श्री केशवचन्द्र सेन ने इसे न माना।

2 – ‘अपने-अपने मत की अच्छी-अच्छी पांच बातें कागज पर लिखें जो सब में हैं, वही मान लें”।

इससे अन्य प्रतिनिधि तो मान गये पर श्री केशवचन्द्र ने नहीं माना। उनका कहना था महाराज की बाते तो सबों में मिल जायेगी पर जिन बातों को लेकर हम लोग अपना-अपना पथ बनाए हुए हैं वें छूट जायेंगी। कारण स्पष्ट है दयानन्द धर्म वाले थे दूसरे मत वाले नहीं। वे अधर्म मत वाले थे।

दोनों तरीको के असफल होने के बाद महाराज ने तीसरा तरीका निकाला “आर्य समाज की स्थापना की। सर्वप्रथम हाजी अल्ला रक्खा ने समाज निर्माण में 10000 (दस हजार रुपये) दिये आर्य समाज के दस नियम भी खान बहादुर अब्दुल की कोठी पर ही बने। अतः स्पष्ट है आर्य समाज मात्र सज्जन पुरुषों का संगठन है। जिसकी प्रमुख घोषणा इस प्रकार है।

प्रथम घोषणा – मनुष्य एक जाति है। और उसका एक ही भेद है। कुछ लायक हैं, कुछ नालायक है जैसे हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई और जैनी का एक गैंग है वे सभी चोर हैं तो पुलिस उसे चोर कहेगी। विभेद नहीं है। सज्जन लायक या आर्य उसे कहते है। जो दूसरे को फायदा पहुंचाने की इच्छा करे। अनार्य या नालायक वह है जो दूसरों से फायदा लेने के चक्कर में रहे। क्या खायें? किसका खायें? कैसे खायें? यह बात जो सोचे वही नालायक है और जो क्या खिलाएं? किसको खिलए? कैसे खिलाए? ऐसा सोचे वह लायक है, सज्जन है, आर्य है। आर्य समाज के छटे नियम में लिखा है- ‘संसार का उपकार करना” अतः जो ऐसा करे वही सभासद है।

यह काम वही करेगा जो विद्वान्, सदाचारी और परोपकारी तीनों हो। दयानन्द तीनों गुणों में पूर्ण थे तभी तो 18 घण्टे की समाधि छोड़ी। ऐसे का यथा योग्यसत्कार करना चाहिये। केवल विद्वान् हो तो चोरी का रिकार्ड तोड़ देगा। आज चोर एम. ए., एम. एस. सी. ही नहीं डाक्टर की उपाधि प्राप्त है और उसे पकड़ने वाला वी ए., बी. एस. सी. है। अतः दुनिया में कोलाहल मचा है जैसे रावण विद्वान् था पर बुराईयों का रिकार्ड तोड़ दिया। नये पैमाने से दूसरी घोषणा लायक चार हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। यह चारों छोटे बड़े नहीं। बस रुचि ओर गति से ही बंटे हैं। नालायक चार है-अज्ञान, अन्याय, अभाव, आलस्य। अतः इसे हटाकर चार ज्ञान न्याय भाव गति व सहयोग देने के लिये चार ही लायक बने हैं। शूद्रों का इन तीनों को गति व सहयोग देना आवश्यक है। अतः तीनों के यह समान है। ये स्वेच्छा से बंटे हैं, जन्म से नहीं। रज और वीर्य से मानव बना है। “जैसे हाई स्कूल तक सभी एक। पर बाद आई. ए. एस., सी. ए., डाक्टर, इजीनीयर कौन बना। बस! इस प्रकार जन्म से सभी एक, बाद में वर्ण बने। शूद्र नियामक है वरदान है, यह दूसरी घोषणा है।

तीसरी घोषणा- “आर्य विशेषण है एडजेक्टीव है संज्ञ नाऊन नहीं। यह कर्म से है जन्म से नहीं। आर्य लायक है। आय पैदा नहीं होता, बनना होता है। अतः आर्य नाम की जाति कहन ही इतिहासकारों की भयंकर भूल है। अतः आर्य स्वतः नहीं होता किसी का भी बेटा लायक, (आर्य) हो सकता है। बस आज आवश्यकता है दूसरे के लायक (आर्य) बेटे को अपना बेटा बना लिया जाये। इससे दो बात होगी उन्हें प्रोत्साहन मिलेगा और तुम्हें आनन्द मिलेगा, चिन्ता मिटेगी।

चोथी घोषणा- सुख दुःख जीवात्मा के शुभाशुभ का फल है। परमात्मा नहीं देता। परमात्मा में दुख नहीं है। उसमें यह लक्षण ही नहीं घटता, अत: वह नहीं देता। परमात्मा के पास सुख दुःख है ही नहीं । इसलिये उससे यह मत मांगो। सुख चाहे, सही करो। दुःख चाहो गलत करो। दुःख में घबराओं नहीं, सुख में इतराओं नहीं! कहा गया है-

देह घेर कर दण्ड है सब काहू को होय । ज्ञानी भुगते हंस-हंस के मूरख भुगते रोय।। इसलिये परमात्मा से आनन्द माँगो यही है उसके पास है

अत: वह आनन्द दे देगा।

प्रश्न- परमेश्वर सगुण है, वा निर्गुण?

उत्तर- दोनो प्रकार है

जैसे जड़ के रूपादि गुण हैं और चेतन के ज्ञानादि गुण जड़ में नहीं हैं, वैसे चेतन में इच्छादि गुण हैं और रूपादि जड़ के गुण नहीं हैं। इसीलिए जो गुणों से सहित वह ‘सगुण’ और जो गुणों से रहित वह ‘निर्गुण’ कहलाता है। अपने-अपने स्वाभाविक गुणों से सहित और दूसरे विरोधी के गुणों से रहित होने से सब पदार्थ ‘सगुण’ और ‘निर्गुण’ हैं। कोई भी ऐसा पदार्थ नहीं कि जिसमें केवल निगुर्णता वा केवल सगुणता हो किन्तु एक ही सगुणता और निर्गुणता सदा रहती है। वैसे ही परमेश्वर अपने अनन्तज्ञान बलादि से सहित होने से ‘सगुण’ और रूपादि जड़ के तथा द्वेषादि जीव के गुणों से पृथक होने से परमेश्वर ‘निर्गुण’ कहाता है।

सत्यार्थ प्रकाश, सप्तम समुल्लास

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